अकाउंट्स ऑफ़िस के बाहर उस दिन ग़ैर मामूली रौनक थी।
सब लोग हाजी बशीर साहब से हाथ मिला रहे थे, उन्हें मुबारकबाद दे रहे थे।
किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी, किसी की ज़बान पर दुआएँ।
और हाजी बशीर साहब…
वो भी मुस्कुरा रहे थे।
मगर उस मुस्कुराहट में अजीब सी थकन छुपी हुई थी।
30 साल…
पूरे 30 साल उन्होंने सरकारी नौकरी की थी।
गरमी हो या सर्दी,
बारिश हो या धुंध,
वो रोज़ वक़्त पर दफ़्तर पहुँचते थे।
फ़ाइलें संभालते, लोगों के मसाइल सुनते, और ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाते।
दफ़्तर में अक्सर लोग कहते:
“बशीर साहब जैसे लोग अब कहाँ मिलते हैं?”
और वो हमेशा हल्का सा मुस्कुरा देते।
रिटायरमेंट वाले दिन एक साथी ने गले लगाकर कहा:
“अब तो हाजी साहब आराम करेंगे… ज़िंदगी इंजॉय करेंगे… बच्चों और पोतों के साथ वक़्त गुज़ारेंगे…”
ये सुनकर उनकी आँखों में एक चमक सी आ गई।
उन्होंने दिल ही दिल में सोचा:
“शायद वाक़ई अब सुकून का वक़्त आ गया है…”
घर पहुँचे तो बीवी ने उनकी पसंद का खाना बनाया।
छोटा पोता दौड़ता हुआ आया और गले लगकर बोला:
“दादा अबू! अब आप रोज़ हमारे साथ रहेंगे ना?”
हाजी बशीर साहब ने उसे सीने से लगा लिया।
उस रात वो बहुत खुश थे।
उन्होंने सोचा:
अब सुबह जल्दी उठने की फ़िक्र नहीं…
अफ़सर के फ़ोन नहीं…
फ़ाइलों का दबाव नहीं…
लेकिन…
उन्हें क्या मालूम था कि असल आज़माइश तो अब शुरू होने वाली है।
पहला महीना तो हँसी-खुशी गुज़र गया।
फिर एक दिन बिजली का बिल आया।
उन्होंने काफ़ी देर तक ख़ामोशी से बिल को देखा।
बीवी ने पूछा:
“क्या हुआ?”
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा:
“आधी पेंशन तो सिर्फ़ बिलों में चली जाएगी…”
बीवी ख़ामोश हो गई।
कुछ दिन बाद दवाइयाँ ख़त्म हो गईं।
शुगर, ब्लड प्रेशर, जोड़ों का दर्द…
डॉक्टर ने नई दवाइयाँ लिख दीं।
मेडिकल स्टोर पर जब बिल बना तो हाजी बशीर साहब के हाथ काँप गए।
“छह हज़ार…?”
उन्होंने हैरत से पूछा।
दुकानदार ने अफ़सोस से कहा:
“हाजी साहब, दवाइयाँ बहुत महँगी हो गई हैं…”
उन्होंने जेब टटोली।
पर्स खोला।
पैसे कम थे।
उन्होंने आहिस्ता से कुछ दवाइयाँ वापस रख दीं और बोले:
“ये वाली अभी रहने दें…”
उस रात वो देर तक छत को ताकते रहे।
नींद आँखों से कोसों दूर थी।
बीवी ने आहिस्ता से पूछा:
“सोए नहीं अभी तक?”
वो कुछ देर ख़ामोश रहे, फिर धीमी आवाज़ में बोले:
“मैंने सोचा था रिटायरमेंट के बाद सुकून होगा…”
और फिर ख़ामोश हो गए।
चंद महीनों बाद हालात और मुश्किल हो गए।
घर के ख़र्चे बढ़ते जा रहे थे,
मगर पेंशन वही पुरानी थी।
एक दिन उनका बेटा परेशान हालत में घर आया।
खाने के बाद धीरे से बोला:
“अबू… बच्चों की फ़ीसें बहुत बढ़ गई हैं…”
वो ख़ामोशी से सुनते रहे।
बेटा शायद कुछ और कहना चाहता था, मगर कह न सका।
लेकिन एक बाप अपने बच्चों की ख़ामोशी भी समझ जाता है।
उसी रात हाजी बशीर साहब ने अपनी पुरानी घड़ी निकाली।
वो घड़ी जो उन्हें रिटायरमेंट पर तोहफ़े में मिली थी।
अगले दिन वो उसे बेच आए।
घर वापस आए तो पोती ने पूछा:
“दादा अबू, आपकी ख़ूबसूरत घड़ी कहाँ गई?”
वो चंद लम्हे ख़ामोश रहे, फिर मुस्कुरा कर बोले:
“बेटा… पुरानी हो गई थी…”
मगर हक़ीक़त ये थी कि
उस घड़ी की क़ीमत से उन्होंने घर का राशन खरीदा था।
आहिस्ता आहिस्ता वो बदलने लगे।
जो शख़्स कभी हर महफ़िल की रौनक होता था, अब ख़ामोश रहने लगा।
जो बच्चों को घुमाने ले जाता था, अब अक्सर कमरे में अकेला बैठा रहता।
एक दिन एक दोस्त मिलने आया।
बातों बातों में उसने पूछ लिया:
“यार बशीर… रिटायरमेंट के बाद ज़िंदगी कैसी गुज़र रही है?”
वो चंद लम्हे ख़ामोश रहे, फिर हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोले:
“बस… गुज़ार रहे हैं…”
मगर उनकी आँखें सच बोल रही थीं।
फिर एक दिन अचानक उनकी तबीयत बहुत ख़राब हो गई।
हॉस्पिटल ले जाना पड़ा।
डॉक्टर ने कई महँगे टेस्ट लिख दिए।
बेटा काग़ज़ देखकर परेशान हो गया।
हाजी बशीर साहब ख़ामोशी से बेटे का चेहरा देखते रहे।
उन्हें पहली बार शिद्दत से महसूस हुआ कि
वो शायद अपने बच्चों पर बोझ बनते जा रहे हैं।
और यही एहसास
उन्हें अंदर से तोड़ गया।
रात को हॉस्पिटल के बेड पर लेटे हुए वो ख़ामोशी से छत को देखते रहे।
आँखों से आँसू बह रहे थे।
वो आहिस्ता से बोले:
“या अल्लाह…
क्या 30 साल की नौकरी के बाद इंसान को यही दिन देखने होते हैं?”
ये सिर्फ़ हाजी बशीर साहब की कहानी नहीं।
ये उन लाखों पेंशनर्स की कहानी है
जिन्होंने अपनी जवानी, अपनी सेहत और अपनी ज़िंदगियाँ इस मुल्क के लिए वक़्फ़ कर दीं।
आज वही लोग
दवाई, इज़्ज़त और सुकून के लिए तरस रहे हैं।
सबक़
रिटायरमेंट सिर्फ़ नौकरी का इख़्तिताम नहीं होती,
ये एक ऐसे मरहले की शुरुआत भी हो सकती है
जहाँ इंसान को सबसे ज़्यादा इज़्ज़त, तवज्जो और सहारा दरकार होता है।
अपने वालिदैन, बुज़ुर्गों और पेंशनर्स की क़दर कीजिए।
क्योंकि एक वक़्त था
जब उन्होंने अपनी ख़्वाहिशात क़ुर्बान करके
हमारी ज़िंदगी आसान बनाई थी।