परिवार क्यों बिखर रहा है? खाने से जोड़ें

जिन घरों में लोग रोज़ाना दस्तरख़्वान पर इकट्ठे होते हैं, उन घरों का माहौल दूसरों से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ होता है। वहाँ अक़दार जन्म लेती हैं, रिश्ते मज़बूत होते हैं और एक ख़ास ख़ानदानी तहज़ीब परवान चढ़ती है।

दस्तरख़्वान सिर्फ़ पेट भरने की जगह नहीं, यह सक़ाफ़त और तरबियत का मरकज़ होता है। पेट तो इंसान कहीं भी भर सकता है, मगर दस्तरख़्वान वो जगह है जहाँ दिल जुड़ते हैं, बातें होती हैं और नस्लों को एक-दूसरे से जोड़ने का अमल जारी रहता है।

दस्तरख़्वान दरअसल एक ख़ानदानी क़दर है। जिन घरों में आला ख़ानदानी रवायत होती हैं, वहाँ खाने के इस मुश्तरका वक़्त को ग़ैर-मामूली अहमियत दी जाती है। एक दोस्त ने बताया कि उनके वालिद और उनके भाई हर हफ़्ते लाज़िमी तौर पर इकट्ठे खाना खाते हैं। बज़ाहिर यह एक मामूली बात लगती है, मगर हक़ीक़त में यह महज़ खाना नहीं बल्कि ख़ानदान को जोड़ने का एक ख़ूबसूरत बहाना होता है।

हमारा दीन भी हमें दस्तरख़्वान को वसीअ करने और मिल बैठकर खाने की तरग़ीब देता है।

अगर मुमकिन हो तो घर के तमाम अफ़राद को दिन में कम अज़ कम एक मरतबा ज़रूर इकट्ठा बैठकर खाना चाहिए। अगर वालिदैन साथ रहते हों तो उन्हें अलग कमरे में खाना पहुँचाने के बजाए दस्तरख़्वान पर साथ बिठाया जाए। अगर किसी जिस्मानी मजबूरी के बाइस ऐसा मुमकिन न हो तो फिर अलग इंतज़ाम किया जा सकता है, मगर आम हालात में वालिदैन के लिए औलाद के साथ बैठना खाने से कहीं ज़्यादा ख़ुशी का बाइस होता है।

हमारे हल्क़ा-ए-अहबाब में एक ख़ातून इस बात पर बेहद दिल-गिरफ़्ता रहती हैं कि एक ही घर में रहते हुए भी उनका बेटा उनके साथ खाना नहीं खाता। वह अपनी बीवी बच्चों के साथ अलग खाता है और वालिदा का खाना उनके कमरे में पहुँचा दिया जाता है। यह तर्ज़-ए-अमल बज़ाहिर सहूलत का नाम है, मगर इसके पीछे वालिदैन की तनहाई छुपी होती है।

अल्लाह का ख़ौफ़ कीजिए और वालिदैन के साथ दस्तरख़्वान पर ज़रूर बैठा कीजिए।

अक्सर घरों में यह रिवाज भी है कि वालिदैन जल्दी खाना खा लेते हैं और औलाद रात गए खाती है। अगर कोई मजबूरी न हो तो ख़ुद भी जल्दी खाने की आदत डालें। यह सेहत के लिए भी बेहतर है, क्योंकि देर से खाना और देर तक जागना दोनों नुक़सानदेह हैं।

खाना दुनिया के हर जानदार की बुनियादी ज़रूरत है, मगर खाने की तहज़ीब हम इख़्तियार करते हैं, क्योंकि हमें तमाम मख़लूक़ात में एक ख़ास मक़ाम अता किया गया है।
हमारे खाने सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं होने चाहिएँ, बल्कि दिलों और रिश्तों को जोड़ने का सबब बनने चाहिएँ।

दस्तरख़्वान पर ख़ानदान का इकट्ठा होना एक मज़बूत, मुतवाज़िन और सेहतमंद ख़ानदान की बुनियाद रखने में निहायत अहम किरदार अदा करता है।