उसकी बीवी ने बहुत कोशिश की कि कोई जनाज़ा उठाने वाला मिल जाए, कोई नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ा दे, मगर हर तरफ़ ख़ामोशी थी। आख़िरकार उसने चंद मज़दूरों को उजरत देकर मय्यत को गाँव से बाहर एक सुनसान सहरा की तरफ़ ले जाने का इंतिज़ाम किया। वहाँ भी कोई ऐसा न था जो उसके जनाज़े के लिए खड़ा होता।
इसी सहरा के क़रीब एक पहाड़ी पर एक इबादत गुज़ार बुज़ुर्ग रहते थे, जो अपनी इबादत, तक़वा और परहेज़गारी की वजह से मशहूर थे। अचानक वो पहाड़ से नीचे उतरे और सीधे उस जनाज़े के पास आ गए। उन्होंने फ़रमाया कि वो इस शख़्स की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाएँगे।
ये ख़बर देखते ही देखते पूरे इलाक़े में फैल गई कि एक नेक और इबादत गुज़ार बुज़ुर्ग एक बदनाम शख़्स के जनाज़े में शरीक होने आए हैं। लोग हैरान होकर दौड़ते हुए वहाँ पहुँचने लगे और सब ने उन बुज़ुर्ग की इक्तिदा में नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।
नमाज़ के बाद लोगों ने हैरत से पूछा:
“आप जैसे इबादत गुज़ार शख़्स ने एक ऐसे गुनाहगार के जनाज़े की नमाज़ क्यों पढ़ाई जिससे लोग ज़िंदगी भर नफ़रत करते रहे?”
बुज़ुर्ग ने जवाब दिया:
“मुझे ख़्वाब में हुक्म दिया गया कि फलाँ मक़ाम पर जाओ, वहाँ एक जनाज़ा होगा जिसके साथ सिर्फ़ एक औरत होगी। उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा ज़रूर पढ़ना, क्योंकि अल्लाह तआला ने उस शख़्स की मग़फ़िरत फ़रमा दी है।”
ये सुनकर सब हैरान रह गए।
फिर उस शख़्स की बीवी को बुलाया गया और उसके बारे में पूछा गया। उसने रोते हुए बताया:
“वो वाक़ई गुनाहों में मुब्तला था, मगर उसमें चंद खूबियाँ भी थीं जिन्हें शायद लोग नहीं जानते थे।”
फिर उसने बताया:
1️⃣ जब भी वो नशे की हालत से कुछ होश में आता, तो सबसे पहले फ़ज्र की नमाज़ बाजमाअत अदा करता, फिर दोबारा अपनी ग़फ़लत में चला जाता।
2️⃣ उसके घर में चंद यतीम बच्चे रहते थे जिनका वो अपने बच्चों से भी ज़्यादा ख़याल रखता था।
3️⃣ रात के वक़्त जब उस पर नदामत तारी होती तो वो रोते हुए अल्लाह से कहता:
“ऐ अल्लाह! तू इस गुनाहगार बंदे से जहन्नम का कौन सा हिस्सा भरना चाहता है?”
ये सुनकर लोगों पर ख़ामोशी तारी हो गई।
वो इबादत गुज़ार बुज़ुर्ग भी वापस लौट गए, मगर सब के दिलों में एक गहरा सबक छोड़ गए।
अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है।
कभी किसी इंसान के ज़ाहिर को देखकर उसके अंजाम का फ़ैसला नहीं करना चाहिए, क्योंकि दिलों के हाल, आँसुओं की सच्चाई और तौबा की कैफ़ियत सिर्फ़ अल्लाह जानता है।
सबक़
किसी इंसान को हमेशा उसके ज़ाहिरी आमाल से न परखें।
मुमकिन है जिसे दुनिया हक़ीर समझ रही हो, वो अल्लाह के नज़दीक मक़बूल हो।
और मुमकिन है जिसे लोग नेक समझते हों, वो अल्लाह के यहाँ वैसा न हो।
अल्लाह तआला हम सब को सच्ची तौबा, नर्मी-ए-दिल और दूसरों के बारे में अच्छा गुमान रखने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।